सरकारी चेक वापसी पर भी सजा होनी चाहिए

दो साल पहले जब अरहर सहित अन्य दालों के दाम आसमान छू रहे थे तब म.प्र. सरकार ने किसानों को दलहन का उत्पादन बढ़ाने हेतु काफी ऊंचे न्यूनतम समर्थन मूल्य की पेशकश कर दी। नतीजा ये निकला कि किसानों ने लालच में आकर धड़ाधड़ दालों की फसल उगा दी। खूब उत्पादन भी हुआ लेकिन जब सरकारी एजेंसी के पास बेचने गए तो वही पुराना ढर्रा देखने मिला। जैसे-तैसे खरीदी हुई तो भुगतान के लिए टरकाया जाता रहा। रो-गाकर चैक मिले तो किसान की जान में जान आई लेकिन अब खबरें आ रही हैं कि जिस सरकारी एजेंसी ने खरीदी के बदले चैक दिए थे वे बिना भुगतान हुए बैंक से लौट रहे हैं जिसे बाउंस कहा जाता है। एक तो खरीदी में धक्के खाने की नौबत, फिर भुगतान में जरूरत से ज्यादा देर और अब चैक के बिना भुगतान लौट आने से किसान की दाल पतली हो रही है। नई फसल हेतु उसे बीज, खाद और अन्य जरूरी चीजें खरीदने के लिए नगद राशि चाहिए लेकिन महीनों तक चक्कर लगाने और प्रतीक्षा करने के बाद मिला चैक भी यदि किसी काम का नहीं निकले तो किसान का नाराज और निराश होना लाजमी है। चंद अपवादों को छोड़ दें तो अधिकतर किसानों के पास पूंजी का अभाव रहता है। इसकी भरपाई हेतु वह बैंक या साहूकार से कर्ज लेता है। खेती के आधुनिकीकरण के चलते फसल का लागत मूल्य बढ़ता ही जा रहा है। भंडारण की पर्याप्त सुविधा नहीं होने से किसान के सामने फसल आते ही उत्पादन ठिकाने लगाने की बाध्यता होती है। बाजार के अपने नियम-कायदे हैं जिनमें किसान के हितों के प्रति कोई सहानुभूति अथवा संवेदनशीलता नहीं होती। बैंक भी एनपीए घटाने के फेर में किसानों पर तरह-तरह के दबाव बनाया करते हैं। म.प्र. शासन को कृषकों के प्रति बेहद संवेदनशील माना जाता रहा है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपने को किसान बताते नहीं थकते। विगत अनेक वर्षों से म.प्र. कृषि उत्पादन में देश का अग्रणी राज्य बना हुआ है। लेकिन हालिया घटनाओं से ढोल की पोल सामने आ गई है। मंदसौर में किसानों पर चली गोली के पीछे के कारणों को छोड़ दें तो भी प्रदेश में किसानों के मन में व्यवस्था के प्रति जो गुस्सा और असंतोष है उसका संज्ञान मुख्यमंत्री को लेना ही चाहिए। लोकतंत्र में चुनी हुई सरकार के अधिकतर काम और निर्णय आगामी चुनाव को दृष्टिगत रखकर किए जाते हैं। शिवराज सिंह को भी 2018 के विधानसभा चुनाव की चिंता सताने लगी है। यही वजह है कि मंदसौर किसान आन्दोलन में मारे गए लोगों को उन्होंने बिना आगा-पीछा सोचे एक-एक करोड़ का मुआवजा देने का फैसला कर डाला किन्तु इसके बाद भी न किसानों की आत्महत्या रुकी और न ही उनके मन में सरकारी अव्यवस्था के प्रति व्याप्त वितृष्णा कम हो रही है। दालों की खरीदी के चैक बिना भुगतान लौट आना व्यापारिक लेन-देन के लिहाज से भले सामान्य बात हो परन्तु साधारण किसान इस तरह की दुनियादारी से दूर रहने की वजह से खुद को लुटा-पिटा समझता है। दाल उत्पादन बढऩे से अव्वल तो उसके दाम नीचे आ गए जिससे किसान को उम्मीदों के मुताबिक पैसे नहीं मिले। वहीं सरकारी खरीद से जो सहारा मिला वह भी धोखा साबित हो रहा है। प्रश्न ये है कि क्या शिवराज सिंह और उनके मदमस्त अधिकारी वास्तविकता से अनजान हैं। यदि नहीं तो ये उनकी अक्षमता का प्रमाण है और यदि वे किसानों की समस्याओं से वाकिफ हैं तब उनका उपेक्षा भाव अपराधिक उदासीनता का पर्याय है। यदि किसी व्यक्ति अथवा प्रतिष्ठान का चैक बिना भुगतान लौट आता है तब वह सजा का भागीदार बन जाता है। लेकिन जब सरकारी चैक ही बाउंस होने लगे तब दंड किसे दिया जाना चाहिए ये भी साफ होना जरूरी है।

Be the first to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published.


*