राष्ट्रपति सबका किंतु प्रचार केवल अपनों में

राष्ट्रपति पद के दोनों प्रत्याशी विभिन्न राज्यों में जा-जाकर विधायकों से मिल कर अपने पक्ष में मतदान करने का अनुरोध कर रहे हैं। पहले भी ये तरीका आजमाया जाता रहा है। लेकिन इस अभियान में देखने वाली बात ये है कि रामनाथ कोविंद जहां भाजपा एवं एनडीए के घटक दलों से ही मिल रहे हैं वहीं मीरा कुमार का ध्यान केवल कांग्रेस तथा उनको समर्थन दे रहे अन्य विपक्षी दलों के विधायकों तक ही सीमित है। यदि एनडीए और यूपीए देश भर से अपने-अपने समर्थक विधायकों को दिल्ली बुलवाकर एक ही जगह अपने प्रत्याशी से मिलवा देते तब भी कोई फर्क नहीं पड़ता। और फिर जिन मतदाताओं का मत पार्टी के निर्देशों से बंधा हुआ हो तो उसके बारे में कोई शंका भी भला क्यों की जावे। बावजूद इसके श्री कोविंद और श्रीमती कुमार विभिन्न राज्यों की राजधानी में पहुंचकर अपने संभावित समर्थकों से अनुनय कर रहे हैं। वैसे प्रत्याशी का अपने मतदाता के पास जाकर निवेदन करना सौजन्यता की दृष्टि से भी उचित प्रतीत होता है किन्तु राष्ट्रपति पद चूंकि दलीय सीमाओं से ऊपर उठकर होता है इसलिये उसका चुनाव लड़ रहे व्यक्ति को चाहिए कि वह दलीय प्रतिबद्धताओं को लांघकर सभी दलों के जनप्रतिनिधियों से मिलकर समर्थन मांगे। मीरा कुमार ने अन्य पार्टियों के विधायकों/सांसदों से इस चुनाव में आत्मा की आवाज पर मत देने की जो अपील की है वह सार्थक हो जाती यदि वे अपने संपर्क अभियान को और वृहद् करतीं। यद्यपि श्री कोविंद ने इस तरह का कोई बयान नहीं दिया परन्तु उनका प्रचार भी केवल भाजपा और उसके समर्थक दलों तक ही सिमटकर रह गया है। ये ठीक है कि रामनाथ जी अपनी विजय के प्रति पूर्ण आश्वस्त हैं वहीं मीरा जी ने अपनी सुनिश्चित पराजय के कारण ही आत्मा की आवाज वाला शिगूफा छोड़ा लेकिन अगर दोनों प्रत्याशी राष्ट्रपति पद की गरिमा के अनुरूप अन्य दलों के बीच जाकर अपनी बात कहते तो इससे उन दोनों का सम्मान ही बढ़ता। राजनीति कितनी भी प्रदूषित क्यों न हो गई हो परन्तु उसमें अभी भी मेल-मुलाकात की गुंजाईश तो बची ही है। यद्यपि राष्ट्रपति चुनाव महज एक औपचारिकता रह गया है परन्तु प्रजातंत्र की भी अपनी कुछ परंपराएं होती हैं जिनमें विरोधी को अछूत नहीं समझना भी है।

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