नई नैतिकता : किसी ने नहीं दिया तो मैं क्यों दूं इस्तीफा

कल शाम एक टीवी चैनल पर लालू प्रसाद यादव का साक्षात्कार चल रहा था। विषय था उनके पुत्र तेजस्वी यादव के इस्तीफे की मांग। यद्यपि लालू अपनी पार्टी राजद के अध्यक्ष भी हैं परन्तु वे एक पिता की तरह बोलते दिखे। तेजस्वी का बचाव करते हुए उन्होंने रेल मंत्री के तौर पर अपने कार्यकाल को स्वर्णयुग बताते हुए अपने बेटे को मासूम और बेकसूर बताया। जब विपक्ष द्वारा की जा रही त्यागपत्र की मांग के बारे में पूछा गया तब तैश में आते हुए लालू ने लालकृष्ण आडवाणी से लेकर शिवराज सिंह चौहान तक के नाम गिनवा दिए जिन पर आरोप होने के बाद भी उन्होंने इस्तीफा नहीं दिया। लालू, प्रधानमंत्री और भाजपा अध्यक्ष तक पर तीखे तीर छोडऩे से नहीं चृके। उनका गुस्सा इस बात पर था कि जब चारों तरफ भ्रष्टाचार के आरोपी पसरे हुए हैं तब उनके बेटे से ही गद्दी छोडऩे क्यों कहा जा रहा है। उनका साक्षात्कार सुनकर साधारण व्यक्ति ने ये स्वीकार कर लिया होगा कि वे सौ फीसदी सच बोल रहे हैं क्योंकि महज आरोप लगने पर ही यदि राजनेता पद छोडऩे लगें तब तो सत्ता चलाने के लिये नेताओं का आयात करने की नौबत तक आ सकती है। वैसे ये कोई पहला मौका नहीं है जब कोई सत्ताधारी नेता भ्रष्टाचार के मामले में बुरी तरह उलझने के बाद भी त्यागपत्र नहीं दे रहा। म.प्र. में व्यापमं मामला जब शबाब पर था तब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी इसी तरह दबाव में थे किन्तु न तो उन्होंने कभी पद छोडऩे की पेशकश की और न ही भाजपा को कभी चाल, चरित्र और चेहरे की बात याद रही। रास्वसंघ जो भाजपा का नीति-नियंत्रक माना जाता है उसने भी श्री चौहान को हटाने को लेकर कोई पहल की हो ये देखने में नहीं आया। कर्नाटक में येदियुरप्पा की वापसी भी भाजपा के पार्टी विथ डिफरेन्स के दावे की हवा निकाल चुकी है। सत्ता में बने रहने के लिये नीति और नैतिकता की तिलांजलि देना भारतीय राजनीति का चरित्र बन गया है। नीतिश कुमार को सुशासन बाबू कहा जाता है किन्तु उन्हें भी सत्ता की खातिर लालू प्रसाद सरीखे बदनाम नेता को ही नहीं अपितु उनके अनुभवहीन एक बेटे को उपमुख्यमंत्री और दूसरे को महत्वपूर्ण विभाग का मंत्री बनाना पड़ा। तेजस्वी विवाद पर भले ही नीतिश को भाजपा से मिला बताया जाता हो परन्तु उसके त्यागपत्र का निर्णय बतौर मुख्यमंत्री स्वयं लेने बजाय के उन्होंने मामला राजद पर छोड़कर कन्नी काट ली। भाजपा खुलकर कह रही है कि नीतिश यदि लालू से गठबंधन तोड़ लें तो वह उनकी सरकार को समर्थन देने एक पाँव पर तैयार है। लेकिन तरह-तरह के रहस्यमय खेल रचने के बाद भी नीतिश ने लालू से रिश्ता तोडऩे का साहस अब तक नहीं दिखाया। संभवत: वे इस बात की प्रतीक्षा कर रहे होंगे कि राजद स्वयं गठबंधन से अलग हो जाए। ये कोई अनोखा मामला नहीं है। कमोबेश भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरा हर नेता लालू और उनके परिवाजनों की तरह ही बेशर्म बनकर सत्ता से चिपका रहता है। जहां तक राजनीतिक पार्टियों का सवाल है तो वे अपने सत्ताधारी नेताओं के शिकंजे में फंसकर रह जाती हैं जिनकी वजह से संगठन का न कोई महत्व रह जाता है न ही रुतबा। राजद, जद(यू), सपा, बसपा, तृणमूल, बीजद, द्रमुक, अद्रमुक, तेलुगू देशम, टीआरएस, और शिवसेना सहित तमाम क्षेत्रीय दलों में आंतरिक प्रजातंत्र न होने से सत्ता या संगठन पर काबिज नेता सर्वशक्तिमान बन बैठे हैं। भाजपा में नरेन्द्र मोदी को रोकने-टोकने की हिम्मत किसी में भी नहीं है। वहीं कांग्रेस पर पूरी तरह गांधी परिवार का एकाधिकार बना हुआ है। ऐसी स्थिति में केवल तेजस्वी को कसूरवार मानकर इस्तीफा मांगने वालों को अपने गिरेबाँ में भी झांकना चाहिए। लालू प्रसाद अपने कुनबे को बचाने के लिये जिस तरह की शेखी बघार रहे हैं उससे न तो वे बच पायेंगे और न ही उनकी छवि में कोई सुधार होने वाला है परन्तु समय आ गया है जब नैतिकता पर अपेक्षाएं और उपदेश बंद होकर उसके पालन की वह परंपरा पुनर्जीवित हो जो आजादी के दो-चार बरस तक ही कायम रह सकी। भारत विश्व की सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था भले हो किन्तु इसी के साथ ही वह सबसे भ्रष्ट देशों में भी शामिल है जिसका सबसे बड़ा कारण राजनीतिक नेताओं की मोटी चमड़ी है। तेजस्वी यादव पद से हटेंगे या हटाये जायेंगे ये विषय उतना महत्वपूर्ण नहीं है। बिहार में महागठबंधन रहेगा या नहीं इससे भी कोई फर्क नहीं पडऩे वाला। सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण प्रश्न ये है कि राजनीति और उसका संचालन कर रहे अधिकतर नेता कभी नैतिकता और ईमानदारी का प्रतीक बन पायेंगे या नहीं? इसी संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय ने अपराधिक मामलों में दोषी नेताओं पर जीवन भर चुनाव लडऩे पर पाबंदी की मांग को गंभीरता से लेते हुए चुनाव आयोग से तल्ख लहजे में पूछा कि वह अपना रवैया स्पष्ट क्यों नहीं कर रहा, क्या वह विधायिका से डरता है? दरअसल आयोग के हलफनामे में दोषी नेताओं पर पाबंदी पर सहमति तो दिखाई दी किन्तु वह पक्के तौर पर कोई ठोस निर्णय लेने की मानसिकता भी नहीं बना पा रहा। दूसरी तरफ केन्द्र ने इसे सुनवाई योग्य मुद्दा न मानते हुए रद्द करने की बात कही। इस बहस की टाइमिंग तेजस्वी प्रकरण से मेल खा गई जो महज संयोग ही हो सकता है परन्तु सत्ता में बैठे महानुभावों के दागदार होने के बावजूद भी यदि कुर्सी पर बने रहने की वर्तमान छूट यथावत रही तब लोकतंत्र को मजाक बनने से कौन रोक सकेगा? तेजस्वी इसलिये इस्तीफा नहीं देंगे क्योंकि उनके पहले जिन पर वैसे ही आरोप लगे उन्होंने सत्ता छोडऩे की सौजन्यता नहीं दिखाई और नीतिश उन्हें हटाने की बजाय गेंद लालू के पाले में ढकेलकर उम्मीद कर रहे हैं कि वे नैतिकता का परिचय दें। कुल मिलाकर अपना घर छोड़कर पड़ोसी के घर में भगतसिंह के पैदा होने वाली कहावत चरितार्थ हो रही है। ऐसे में चाहे अनचाहे उस कटाक्ष को सही मानने की मजबूरी आ खड़ी हुई है कि ईमानदार वह है जिसे या तो बेईमानी करना नहीं आती या फिर वह जिसे उसका अवसर नहीं मिला।

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