चीन पर दोहरा दबाव कारगर होगा

ताजा खबरों के मुताबिक चीन की अर्थव्यवस्था का सुनहरा दौर  ढलान पर है। विगत दो दशक में धूमकेतु की तरह आर्थिक महाशक्ति के तौर पर उभरे चीन ने वैश्विक स्तर पर अपनी जोरदार मौजूदगी से सभी को चौंका दिया। सारी दुनिया की पूंजी वहां निवेशित हो गई। ऐसा कोई भी मशहूर ब्राण्ड नहीं है जिसने चीन में कारखाना न लगाया हो। ऑटोमोबाईल को छोड़ दें तो छोटी-बड़ी प्रत्येक उपभोक्ता  वस्तु के साथ मेड इन चाइना जुड़ गया। चूंकि चीन में बना सामान अपेक्षाकृत सस्ता होता है इस कारण भारत सदृश तीसरी दुनिया के देशों ने अपने बाजार चीनी उत्पादों के लिये खोल दिये। इसके चलते भारत की अर्थव्यवस्था पर विपरीत प्रभाव भी पड़ा। सैन्य क्षेत्र में भी चीन की ताकत बढ़ती चली गई जिसके बल पर वह अपने पड़ोसी देशों को जबरन धमकाया करता है। भारत से उसके संबंध बीते कुछ दिनों से बेहद तनाव बने हुए हैं। भूटान सीमा के भीतर घुसकर सड़क बनाने की चाल को भारतीय सेना द्वारा विफल करने के बाद से चीन बेहद नाराज है तथा खुलकर धमकी देने लगा है। भारत द्वारा कड़ा जवाब दिये जाने से हॉलांकि चीन के कदम ठिठके हुए हैं परन्तु वह खीझ निकालने का कोई अवसर नहीं छोड़ रहा। शायद उसे ये अंदाज नहीं रहा होगा कि भारत की तरफ से इस तरह का प्रतिरोध उसे झेलना पड़ेगा। ऐसा लगता है भारतीय रणनीतिकारों को चीनी अर्थव्यवस्था में आई दरारों का पता चल गया है। विशाल लाल फौज में 10 लाख की छंटनी की खबरें इसी दिशा में संकेत करती हैं। इधर अंदरखानों की खबर है कि रास्वसंघ ने चीनी सामान के बहिष्कार का राष्ट्रव्यापी अभियान छेडऩे की रूपरेखा बना ली है जिसे दीपावली के पहले मैदानी रूप दे दिया जाएगा। चूंकि सरकार विश्व व्यापार संगठन से बंधी होने से चीनी सामान का आयात प्रतिबंधित नहीं कर सकती इसलिये सामाजिक स्तर पर इसके लिये आंदोलन छेडऩे की जरूरत है। रास्वसंघ ने सही समय पर इस बारे में जो निर्णय किया उसका दूरगामी असर होना स्वाभाविक है। हो सकता है मोदी सरकार और संघ के बीच इसे लेकर सहमति और सामंजस्य बना हो। यही वजह है कि जहां सीमा पर भारतीय फौज ने चीन के दबाव के सामने झुकने की बजाय जवाबी दबाव बना दिया वहीं घरेलू मोर्चे पर चीनी सामान के विरोध में जनमत तैयार करने की कार्ययोजना शुरू हो रही है। यदि ये काम दो तीन बरस पहले ही हो जाता तब शायद चीन की हिम्मत ताव दिखाने की नहीं होती। खैर, देर आए दुरुस्त आए की तर्ज पर चीन पर दोहरा दबाव बनाने की रणनीति कारगर हो सकती है बशर्ते उसमें ईमानदारी बनी रहे। नारेबाजी तो खूब होती है किन्तु चीनी सामान का विरोध जब तक घृणा में नहीं बदल जाता तब तक अपेक्षित परिणामों की आशा नहीं की जा सकती। सीमा पर सेना और कूटनीतिक मोर्चे पर सरकार तो दबंगी दिखा ही रही है। अब यदि जनता भी देशहित को लेकर गंभीर और जागरूक हो जाए तो चीन की अकड़ दूर होते देर नहीं लगेगी।

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