सुमित्रा नहीं यह तो भाजपा की किरकिरी है…

नेता-संगठन पावरफुल होता तो सत्ता पर अफसरशाही हावी नहीं होती
जबलपुर। मुझे तो अपनों ने ही लूटा गैरों में कहां दम था…कुछ ऐसा ही हो रहा है नगर निगम अध्यक्ष श्रीमती सुमित्रा बाल्मीकि के साथ। रांझी टीआई से विवाद के बाद टीआई को थाने से हटाने श्रीमती वाल्मीकि ने नगर भाजपा अध्यक्ष से लेकर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष से शिकायत की। पुलिस अधीक्षक के साथ आईजी तक को ज्ञापन दिया लेकिन इतने दिन बीत जाने के बाद भी कुछ नहीं हुआ। नगर भाजपा अध्यक्ष ने यह कहकर अपने हाथ खड़े कर लिए कि मामला प्रदेश अध्यक्ष तक पहुंच गया है इसलिए जो भी होगा भोपाल से होगा। एसपी ने भी एडी. एसपी से जांच करवाने का आश्वासन दिया लेकिन अभी तक दूध का दूध पानी का पानी नहीं हो पाया। टीआई रांझी का कहना है कि मामला मकान के विवाद का है और नगर निगम अध्यक्ष झूठ बोल रही है। वहीं नगर निगम अध्यक्ष की मानें तो उनके क्षेत्र में लोग बताएंगे की सच क्या है। थाने के सीसीटीवी से भी पता चल जाएगा कि टीआई ने अभद्रता की है या नहीं। बात जो भी हो लेकिन एक वरिष्ठ नेत्री एवं दलित महिला रो-रोकर कार्यवाही की गुहार लगा रही है लेकिन उनका कोई साथ नहीं दे रहा। नगर सत्ता तक में सभी उनके साथ नहीं है। क्षेत्रीय विधायक ने भी न जाने क्यों चुप्पी साध रखी है। श्रीमती बाल्मिकि ने जल्दबाजी में यह कह दिया कि टीआई पर कार्यवाही नहीं हुई तो 48 घंटे बाद अन्न-जल त्याग कर धरने पर बैठूंगी लेकिन इतने दिन बीत जाने के बाद भी उन्होंने कोई कदम नहीं उठाया। कुल मिलाकर इस प्रकरण से एक बात जरूर साबित हो रही है यहां नेतृत्व क्षमता की कमी है नेताओं के साथ संगठन की भी नहीं सुनी जा रही और इस मामले में कार्यवाही न होने से नगर निगम अध्यक्ष से ज्यादा भाजपा की ही किरकिरी हो रही है। टीआई को न हटाने के पीछे भाजपा की स्थानीय राजनीति में गुटबाजी भी एक वजह बताई जा रही है। भाजपाइयों के लिए भी यह घटना एक सबक है। नगर निगम अध्यक्ष जैसे अहम पद पर बैठी एक वरिष्ठ नेत्री के साथ ऐसा हो सकता है तो आम कार्यकर्ता और छुटभैये नेताओं की क्या स्थिति होगी।

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